
लवकुशनगर। दीपावली के दूसरे दिन से शुरू होने वाला मोनिया नृत्य बुंदेलखंड के ग्रामीण अंचलों में आज भी व्यापक स्थान लिए है बुजुर्ग की मान्यता है कि मौनिया दल मौन होकर मोर पंख लेकर गांव गांव घूमते हैं। इस नृत्य को करने से इस नृत्य का नाम मौनिया नृत्य रखा गया है साथ ही मौन रहकर व्रत वालों को मोनी बाबा भी कहा जाता है मौन व्रत परमा के दिन इस नृत्य को बुंदेलखंड में दीपावली के समय करने कि परम्परा है। मान्यता के अनुसार जब श्री कृष्ण यमुना नदी के किनारे बैठे हुए थे तभी उनकी सारी गाय कहीं चली गई थी। अपनी गायों को प्यार करने वाले भगवान श्री कृष्णा दुखी होकर मौन व्रत हो गए। इसके बाद सभी ग्वाल दोस्त परेशान होने लगे और गायों की ढूढऩे लगे और उन गायों को लेकर आए तब श्री कृष्ण ने अपना मौन व्रत तोड़ा, तभी से परंपरा के अनुसार श्री कृष्ण के भक्त गांव गांव में मौन व्रत रखकर दीपावली के अगले दिन यानि परमा के दिन इस नृत्य को करते हुए 12 गांव 7 गांव या फिर 5 गांव कि परिक्रमा लगाते हंै। बुंदेली दिवारी नृत्य (बरेदी नृत्य) लठ्ठ का मार्शल आर्ट माना जाता है दिवारी नृत्य जिसमें बरेदी नृत्य में बुंदेली लोक संस्कृति की झलक मिलती है। दीपावली के बाद होने वाले इस दिवारी नृत्य को बुन्देलखण्ड कि अनोखी छटा माना जाता है जिसमें ग्रामीण अंचल में आकर्षक कपड़ों में कलाकारों की टोलियां गांव-गांव में नृत्य की कला का प्रदर्शन करती हैं।बुंदेलखंड का यह दिवारी नृत्य बुंदेली के शौर्य एवं वीरता का प्रतीक माना जाता है इतिहासकारों का मानना है कि चंदेल कालीन शासन में शुरू हुआ यह दिवारी नृत्य जो एक अनूठी लोक विधा का मकसद दर्शाता है कि घर-घर में एक लठमार तैयार हो जो अपना बचाव कैसे करे और अपनी रक्षा कर सकें इसलिए उन्हें तैयार किए जाता था वह बुराई व दुश्मन के खिलाफ लड़ सकें आयोजन का समय दीपावली के कई दिन के पहले ही इसे गांव के लोग अलग अलग टोलिया बनाकर दिवारी खेलने का अभ्यास करने लगते है और जो उसमें अच्छा प्रदर्शन करता है वहीं आदमी या बुजुर्ग उस दिवारी नृत्य या बरेदी नृत्य में हिस्सेदारी ले पता था।मौनिया नृत्य बुंदेलखंड में खास करके अहीर जाति के लोगों द्वारा किया जाता है विशेष रूप से इस नृत्य में पुरुष अपनी पारंपरिक लिवास पहनकर मोर पंखों को लेकर एक घेरा बनाकर नाचते हुए दिखाई देते है








