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तीन दिवसीय लोक साहित्य उत्सव में हुआ लोकभाषा, भाषा, अंतर्संवाद और रचना पाठ

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महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में हुआ शुभारंभ

छतरपुर। मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन और मप्र गांधी स्मारक निधि द्वारा आयोजित तीन दिवसीय लोक साहित्य उत्सव अंतर्गत सोमवार को महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्व विद्यालय में लोकभाषा, भाषा, अंतर्संवाद और रचनापाठ संपन्न हुआ। लोकभाषा, संस्कृति और परंपरा पर संवाद करते हुए ख्यातिलब्ध कथाकार मनीष वैद्य ने आधार वक्तव्य के रूप में कहा कि लोक को बचाना है तो सबसे पहले बोलियों को बचाना पड़ेगा। बुन्देली का फलक बहुत बड़ा और बहुआयामी है, लेकिन हम लगातार बुन्देली बोलने से परहेज करने लगे हैं। यदि बाक़ी बोलियों की तरह बुन्देली भी कमतर होती गई तो हम बुंदेलखंड की समृद्ध जीवन पद्धति और पीढ़ियों की परंपरा से आए अनुभवजन्य ज्ञान को भी बर्बाद कर देंगे।दिल्ली विश्वविद्यालय से आए प्रो. संजीव कौशल ने कहा कि भाषा और बोली का भेद असल में सत्ता संरचना का खेल है। भाषा ताकतवर और सत्ता संपन्न लोगों की होती है और उससे भिन्न भाषा को वे बोलियों और उप-भाषाओं में सीमित कर देते हैं। यह कैसा खेल है कि हिंदी जिसका इतिहास सौ डेढ़ सौ साल पुराना है भाषा बन गई जबकि ब्रज, बुंदेली, हरियाणवी, भोजपुरी, अवधि आदि आदि भाषाएं हिंदी से कमतर हो गईं और बोलियां बन गई, जबकि उनके पास तुलसी, सूर, कबीर और मीरा जैसे महान कवि मौजूद हैं जिनके मुकाबला का हिंदी में आज तक कोई कवि नहीं हुआ है। लोगों को सत्ता के खेल से सतर्क रहना चाहिए और अपनी बोलियों को लगातार समृद्ध करते रहना चाहिए। हमें भाषा और बोलियों के भेदभाव से दूर रहना चाहिए। ख्यात कवि प्रो. मालिनी गौतम ने कहा कि कवि लोक संस्कृति के नाम पर अपने आज के यथार्थ से आँखें चुराने लगे, उसकी जटिलता से भागने लगे तो यह पलायनवाद है। कविताओं में पलायनवाद की यह प्रवृत्ति न सिर्फ कविता के लिए हानिकारक है बल्कि हमारे वर्तमान के लिए भी हानिकारक है। लोक यथार्थ से विद्रोह का कारण तो बने लेकिन लोक संस्कृति वह यथार्थ से बचते हुए, स्वप्न या वह शरणस्थली नहीं बन जानी चाहिए जहाँ आज की जटिलताओं से बचते हुए कवि शरण ले। व्यक्ति को अपना लोक याद आता है तो वह उसका निरूपण बड़े ममतापूर्ण ढंग से करता है, बड़ी करूणता से वह लोक को याद करता है, लोक को पुकारता है और इस करुणता में लोक का नकारात्मक पक्ष ओझल हो जाता है। लोक के नकारात्मक पक्ष के ओझल होने के साथ-साथ यथार्थ का सकारात्मक पक्ष भी ओझल हो जाता है। लोक संस्कृति यदि प्रतिरोध के साधन के रूप में कविता में आती है तो श्रेष्ठ है लेकिन वह शरणस्थली के रूप में या स्वप्न के रूप में नहीं आनी चाहिए।मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन के प्रदेश अध्यक्ष पलाश सुरजन ने कहा की बोलियों के संरक्षण और उत्थान की दिशा में ठोस प्रयास होना चाहिए। आपने सम्मेलन की ओर डॉ. बहादुर सिंह परमार और संतोष कुमार द्विवेदी से इस काम के लिए आगे आने और जिम्मा उठाने के लिए कहा। इसके पूर्व प्रो. बहादुर सिंह परमार ने प्रस्तावना रखते हुए बुंदेली के व्यापक फलक की चर्चा करते हुए कहा कि हमें इस पर काम करने की आवश्यकता है। रचना पाठ सत्र की अध्यक्षता दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. जसवीर त्यागी ने की और प्रो. संजीव कौशल, प्रो. मणि मोहन, निधि अग्रवाल, दौलतराम प्रजापति, नेहा नरूका, महेश अजनबी और शिल्पी जैन आदि ने रचना पाठ किया। विमर्श सत्र का संचालन वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार और संस्कृतिकर्मी संतोष कुमार द्विवेदी ने किया और रचना पाठ सत्र का संचालन सम्मेलन की छतरपुर इकाई के अध्यक्ष नीरज खरे ने किया।

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