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देशज समारोह बुन्देली गायन की प्रस्तुति

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खजुराहो। मध्यप्रदेश शासन संस्कृति विभाग द्वारा स्थापित आदिवर्त जनजातीय लोककला राज्य संग्रहालय खजुराहो के परिसर में प्रत्येक रविवार को नृत्य,नाट्य,गायन एवं वादन पर केन्द्रित समारोह देशज का आयोजन किया जाता है। उक्त गतिविधि के अंतर्गत इस रविवार 07 जनवरी,2024 को सायं 05.30 से छक्कीलाल एवं साथी कलाकार ललितपुर द्वारा’बुन्देली संस्कार गीत’ की प्रस्तुति दी गई, जिसमें छक्कीलाल एवं साथियां द्वारा बुन्देली दादरा,गारी, स्वांग,ढिमरियाई,चौकडिय़ा की प्रस्तुति दी गई। मंच पर प्रस्तुति के दौरान छक्कीलाल, विमला देवी परिहार, रिंकी परिहार, अषोक मस्ताना,शंकर सिंह परिहार, मुकेष मिश्रा, रमसू, धर्म सिंह परिहार, रोषन लाल कलाकारों ने संगत की। इसके बाद अगले क्रम में अगली प्रस्तुति श्रवण सिंह डिण्डोरी एवं उनके साथियों द्वारा शैला तथा करमा नृत्य की प्रस्तुति दी गई। करमा नृत्य कर्म की प्रेरणा देने वाला नृत्य है ग्रामवासियों में श्रम का महत्व है श्रम को ही ये कर्मदेवता के रूप में मानते हैं। पूर्वी मध्यप्रदेश में कर्मपूजा का उत्सव मनाया जाता है। उसमें करमा नृत्य किया जाता है। परन्तु विन्ध्य और सतपुड़ा क्षेत्र में बसने वाले आदिवासी कर्मपूजा का आयोजन नहीं करते। नृत्य में युवक-युवतियाँ दोनों भाग लेते हैं। दोनों के बीच गीत रचना की होड़ लग जाती है। वर्षा को छोड़कर प्राय: सभी ऋतुओं में गोंड आदिवासी करमा नृत्य करते हैं। यह नृत्य जीवन की व्यापक गतिविधि के बीच विकसित होता है, यही कारण है कि करमा गीतों में बहुत विविधता है। वे किसी एक भाव या स्थिति के गीत नहीं है उसमें रोजमर्रा की जीवन स्थितियों के साथ ही प्रेम का गहरा सूक्ष्म भाव भी अभिव्यक्त हो सकता है। मध्यप्रदेश में करमा नृत्य-गीत का क्षेत्र बहुत विस्तृत है,इसी क्रम मे आगे अगली प्रस्तुति सुश्री संगीता पाठक एवं साथियों द्वारा बुन्देली संस्कार गीतो से की गई। प्रस्तुति के दौरान कलाकारो ने राई गीत, सावन गीत, गारी, कर्तिक गीतों की प्रस्तुति दी। प्रस्तुति के दौरान मंच पर संगीता पाठक, गोरेलाल अहिरवार, मुलायम सिंह राजा, पुष्पेंन्द्र पाठक, अवधवेष तिवारी, भुमानी दीन यादव, हर्ष राय, नीरज वर्मा, कल्लू कारपेन्टर कलाकारों ने संगत की। इसी क्रम में अंतिम प्रस्तुति  केशू मार्य द्वारा भगौरिया जनजातीय नृत्य से की गई। मध्यप्रदेश के झाबुआ और अलीराजपुर क्षेत्र में निवास करने वाली भील जनजाति का भगोरिया नृत्य, भगोरिया हाट में होली तथा अन्य अवसरों पर भील युवक-युवतियों द्वारा किया जाता है। फागुन के मौसम में होली से पूर्व भगोरिया हाटों का आयोजन होता है। भगोरिया हाट केवल हाट न होकर युवक-युवतियों के मिलन मेले हैं। यहीं से वे एक-दूसरे के सम्पर्क में आते हैं, आकर्षित होते हैं और जीवन सूत्र में बंधने के लिये भाग जाते हैं इसलिये इन हाटों का नाम भगोरिया पड़ा। भगोरिया नृत्य में विविध पदचाप समूहन पाली, चक्रीपाली तथा पिरामिड नृत्य मुद्राएं आकर्षण की केन्द्र होती हैं। रंग-बिरंगी वेशभूषा में सजी-धजी युवतियों का श्रृंगार और हाथ में तीरकमान लिये नाचना ठेठ पारम्परिक व अलौकिक सरंचना है।
अगले रविवार दिनांक 14 जनवरी 2024 को हरीराम पटेरिया एवं साथी बड़ा मलहरा द्वारा बुन्देली संस्कार गीत एवं दुर्जन पटेल साथी छतरपुर द्वारा बुन्देली राई नृत्य एवं घनष्याम कुशवाहा, खजुराहो द्वारा बुन्देली संस्कार गीत, सुश्री महिमा जैन, सागर द्वारा बधाई लोकनृत्य की प्रस्तुती दी जायेगी

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