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टीकमगढ़ में बिलखता बचपन-सिसकता आवाम, शिक्षा और सुरक्षा व्यवस्था हुई बेलगाम ? दम तोड़ती जिले की शिक्षा और सुरक्षा व्यवस्था, लापरवाही का लगता दीमक

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टीकमगढ़। मर्ज बढ़ती ही गया, ज्यौ-ज्यौ दवा की…कुछ यही हालात इन दिनों जिले के पुलिस एवं शिक्षा विभाग का बना हुआ है। थानों के बिगड़ते हालातों एवं स्कूलों की बिगड़ती दशा ने शिक्षा और सुरक्षा को दीमक लगा दिया है। सिसकते लोगों और बिलखते बच्चों की सिसकारियों को अनदेखा किया जाता रहा है। सरकारी योजनाओं एवं कार्यक्रमों का ठीक से क्रियान्वयन न होने से शिक्षा और सुरक्षा को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं। शिक्षा और सुरक्षा के बिना आम लोगों का जीवन बेकार ही कहा जाएगा। प्रत्येक नागरिक बेहतर शिक्षा और बेहतर सुरक्षा की उम्मीद प्रशासन से करता है। लेकिन मजे की बात यह है कि इन दिनों इन दोनों ही सुविधाओं से लोग महरूम बने हुए हैं। एक ओर जहां अपराध का ग्राफ शहरी एवं ग्रामीण इलाकों में बढ़ता जा रहा है, वहीं दूसरी ओर शिक्षा व्यवस्था की दशा भी जिले में कुछ ठीक नहीं कही जा सकती है। पिछले परीक्षा परिणामों एवं सुरक्षा व्यवस्था पर नजर डाली जाए, तो दोनों की धांधली और लापरवाही की भेंट चढ़ते नजर आ रहे हैं। असमाजिक तत्वों पर अंकुश लगाना तो दूर, अपराधिक घटनाएं होने के बाद भी शहर में खास सरोकार नजर नहीं आ रहा है। बीते दिनों कोतवाली में फरयादी का बिलखना और उसका वीडियो वायरल होना काफी कुछ वयां कर रहा है। कोतवाली से लेकर जिले के अधिकांश थानों में पुलिस की रूचि अपराध रोकने में खास न होकर अन्य अभियानों एवं कार्यक्रमों में ज्यादा दिखाई दे रही है। यही हाल शिक्षा का है। शिक्षकों को पढ़ाई से ज्यादा अन्य कार्यों में लगाया जाना और कई स्कूलों में शिक्षकों की मनमानी एवं उदासीनता ने शिक्षा को दिशाहीन बना दिया है। मजे की बात तो यह है कि इन दिनों खामियों पर पर्दा डालने में भी कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता। छपास रोगियों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है। इसके लिए वह अपने-अपने तरीके से सुर्खियां बटोरने में लगे हुए हैं। शहर में ही दशहरा को हुई घटना के समय पुलिस का तमाशबीन बना रहना और हंगामा होने से आम लोगों में नाराजगी बनी रही। डीजे फूटे, मारपीट हुई और हंगामा होने के बाद भी असमाजिक तत्वों का मौके से निकल जाना पुलिस की सक्रियता पर भी सवाल उठा रहा है। इसके साथ ही चोरी और ठगी जैसे मामलों पर पुलिस की चुप्पी ने चर्चाओं का बाजार गर्म बना दिया है। पुलिस का रवैया देख फरियादी भी अब न्याय की उम्मीद खो चुके हैं। कहा जा रहा है कि गणेशपुरम में बीते 15 सितम्बर से 17 सितम्बर के बीच हुई चोरी की वारदात के मामले में कागजी घोड़े दौड़ाए जाते रहे हैं। अब तक इस घटना का सुराग लगाने में पुलिस असफल साबित हो रही है, या यूं कहा जाए कि अब तक संतोषजनक पहल नहीं की गई है। इतना ही नहीं बीते रोज एक गरीब महिला के जेबर ठगे जाने के मामले में भी अब तक ठीक से जांच पड़ताल तक नहीं की गई है। पुरानी टेहरी निवासी रैकवार गरीब बुजुर्ग महिला ने भी शायद अब उम्मीद खो दी है। जिले में एक ओर पुलिस और पव्लिक के बीच बेहतर संबन्धों की दुहाई दी जाती रही है, वहीं शहर में सुरक्षा एवं शांति व्यवस्था की कलई बढ़ते अपराधों ने खोल कर रख दी है। धारदार हथयारों का प्रदर्शन और प्रहार, ब्लैक मेलिंग, मारपीट एवं अन्य वारदातों के बढऩे और अवैध शराब का बढ़ता कारोबार इन दिनों खासी चर्चाओं में बना हुआ है। एक ओर गांवों में शराब बंदी को लेकर गांवों में जागरूकता नजर आने लगी है, वहीं शहरी इलाकों में गली-कूंचों में अवैध शराब का कारोबार फलफूल रहा है। खनिज परिवहन एवं बिना नंबर वाहनों की भरमार ने आम लोगों के बीच पुलिस प्रशासन की छवि पर गहरा असर छोड़ा है। पुलिस अधीक्षक द्वारा किए जा रहे प्रयासों के चलते जहां ग्रामीण थानों क्षेत्रों में सक्रियता नजर आने लगी है, वहीं शहरी इलाकों में इन आयोजनों के बाद भी खास असर नजर नहीं आ रहा है।
क्या सुधर सकेंगे परीक्षा परिणाम…?
परीक्षा का समय ज्यौं-ज्यौं नजदीक आ रहा है, वैसे वैसे ही शिक्षा जगत में परीक्षा परिणामों को लेकर चिंता नजर आने लगी है। पिछले दो वर्षों से वोर्ड परीक्षाओं में जिले की स्थिति प्रदेश स्तर पर कुछ खास नहीं रही है। इसके बाद भी शिक्षा अधिकारियों की मनमानी एवं लापरवाही कम नहीं हुई है। भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी के आरोपों ने विभाग की छवि पर पानी फेरने का काम किया है। आए दिन स्कूलों में शिक्षकों के नदारत रहने एवं नशे में विद्यालय जाने जैसे वीडियो शिक्षा अधिकारियों की लापरवाही का ही नतीजा कहा जा रहा है। यहां स्कूलों की पढ़ाई को चौपट करने में भी अधिकारियों का योगदान रहा है। अपने खास लोगों को स्कूलों से ओडी पर लगाए जाने और संबन्धित स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था चौपट रखने में कार्यालय का ही हाथ माना जाता रहा है। प्रतियोगिताओं, आयोजनों एवं ग्रामीण अंचलों में होने वाले आयोजनों का भी शिक्षा की दशा बिगाडऩे में कम योगदान नहीं रहा है। शिक्षक स्कूलों से ज्यादा स्कूलों के बाहर अपना समय गुजारने का मजबूर है। कई प्रकार के प्रपत्र और जानकारियां जुटाने में ही शिक्षकों का काफी समय निकल जाता है। इसके साथ ही भीतरी ग्रामों में शिक्षकों की कमीं और शहरी एवं नजदीकी स्कूलों में आवश्यकता से अधिक शिक्षकों की तैनाती भी शिक्षा के हालात बिगाड़ रहे हैं। असरदार शिक्षकों की नेतागिरी एवं स्कूलों से उनका मोहभंग रोक पाने में प्रशासन अब तक कामयाब नहीं हो सका है। मध्यान्ह भोजन की दशा को लेकर भी चर्चाएं आम रही हैं। जिले में जनप्रतिनिधियों की अब तक सुरक्षा एवं शिक्षा व्यवस्था को लेकर कम ही रही है। इस दिशा में ठोस पहल किए जाने की जरूरत बताई जा रही है। कहा जा रहा है कि बेहतर व्यवस्थाओं के बिना विकास अधूरा लगता है। योजनाओं का क्रियान्वयन सही हो और कर्मचारी अपना कार्य सही तरीके से करेंगे, तभी लोगों की मायूसी दूर हो सकेगी।
181 में शाबासी पाने की लगी होड़-
इन दिनों एक साहब काफी चर्चाओं में बने हुए हैं। उनके चर्चाओं में रहने का कारण भी अजीब है। पुलिस अधीक्षक द्वारा 181 के मामलों को गंभीरता से लेते हुए थाना प्रभारियों को निर्देश क्या दिए, कि एक साहब ने वाहवाही लूटने के लिए अजीब तरीका अख्तियार किया है। सूत्रों का कहना है कि एक साहब अपने परिचितों से 181 पर शिकायत कराने और उनका निराकरण करने में पीछे नहीं है। फार्मूला अच्छा है। खुद शिकायत कराएं और खुद ही हटवाएं और फिर क्या एक रिकार्ड बनेगा सो अलग…। साहब के निर्देशों का सख्ती से पालन और शिकायतों का शत-प्रतिशत निराकरण…। शाबासी और पुरस्कार भी …। अब ऐसे में सही काम करने वालों को तो पुरस्कार और शाबासी दोनों ही मिलना मुश्किल है। कुछ भी हो…चर्चा गलियारों में गर्म है।

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