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श्रीमद् भागवत कथा श्रृंखला -1

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भागवत कथा भगवान के प्रति अनुराग उत्पन्न करती है: श्री कौशिक जी1

छतरपुर । सत्कर्म ही प्राणी का प्रथम कर्तव्य है। सत्कर्म से ही सनातन धर्म की रक्षा होती है। जब-जब जीवात्मा प्रभु को समर्पित होती है तथा प्राणी प्रभु की सेवा में लीन होता है तब-तब प्राणी को प्रभु की भक्ति प्राप्त होती है तथा जीव का स्वभाव परिवर्तित होता है। जड़ चेतन में जहां-जहां भक्ति प्रवेश करती है वहां का स्वरूप ही बदल जाता है। यह बात श्रीमद् भागवत कथावाचक श्री भगवती प्रसाद जी कौशिक ने कही।चेतगिर कॉलोनी हनुमान मंदिर छतरपुर में आयोजित संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा के पहले दिन सोमवार को 4 बजे कथा स्थल से कलश शोभा यात्रा जवाहर मार्ग, चेतगिर एवं सीताराम कॉलोनी के मुख्य मार्गों से गुजरी। विशाल शोभा यात्रा में कथा प्रेमियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। शोभा यात्रा पश्चात श्रीमद् भागवत कथा प्रारम्भ हुई।श्री धाम वृन्दावन निवासी श्री कौशिक जी पहले दिन भागवत कथा का महत्व बताते हुए कहते है कि मृत्यु को जानने से मृत्यु का भय मन से मिट जाता है, जिस प्रकार परीक्षित ने भागवत कथा का श्रवण कर अभय को प्राप्त किया, वैसे ही भागवत जीव को अभय बना देती है। श्री कौशिक जी कहते है कि श्रीमद्भागवत कथा परमात्मा का अक्षर स्वरूप है। यह परमहंसों की संहिता है, भागवत कथा हृदय को जागृत कर मुक्ति का मार्ग दिखाता है। भागवत कथा भगवान के प्रति अनुराग उत्पन्न करती है। यह ग्रंथ वेद, उपनिषद का सार रूपी फल है। यह कथा रूपी अमृत देवताओं को भी दुर्लभ है।गौरतलब है कि यह संगीतमयी भागवत कथा प्रतिदिन तीन बजे से प्रारंभ होकर शाम सात बजे तक चलती है। सभी कथा प्रेमियों से आग्रह है कि अधिक से अधिक संख्या में पधार कर अमृतमयी कथा का श्रवण कर अपने आपको धन्य बनाएं।

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