
रात से शुरु हुआ जलाभिषेक का दौर शाम तक रहा जार
बिजावर। चैत्र माह की सोमवती अमावस्या के दिन जिले के प्रसिद्ध तीर्थ एवं पर्यटन स्थल श्री जटाशंकर धाम में श्रद्धालुओं का सैलाब देखने को मिला। एक अनुमान के मुताबिक रविवार की शाम से सोमवार की रात तक यहां करीब 1 लाख से अधिक श्रद्धालु पहुंचे हैं। रविवार की शाम को ही भक्तों के आने का क्रमा शुरु हो गया था। कुछ भक्तों ने रात को 12 बजते ही जटाशंकर के कुंडों में स्नान कर भोलेनाथ का अभिषेक किया। वहीं सोमवार की सुबह 12 बजे से शाम 5 बजे तक मंदिर में भारी भीड़ रही। दोपहर में जटाशंकर पहुंचे कई भक्तों ने जलाभिषेक के बाद भगवान सत्यनारायण की कथा सुनी और जरूरतमंदों में अन्नदान भी किया। कई भक्तों के द्वारा मंदिर में पितरों की पूजा के लिए विशेष अनुष्ठान भी कराया गया।
लोकन्यास श्री जटाशंकर धाम ने किए व्यापक इंतजाम
लोकन्यास श्री जटाशंकर धाम अध्यक्ष अरविंद अग्रवाल ने बताया कि श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटने की संभावना के मद्देनजर लोकन्यास श्री जटाशंकर धाम द्वारा व्यापक प्रबंध किए गए थे। मंदिर प्रांगण में आधा दर्जन से अधिक नए वाटर पॉइंट बनाए गए थे और इनके साथ ही पुराने एक दर्जन वाटर पॉइंट भी एक्टिव रखे गए। मंदिर प्रांगण की साफ-सफाई, व्यवस्थित दर्शन व्यवस्था हेतु अतिरिक्त वालंटियर भी तैनात किए गए थे। समस्त व्यवस्थाओं की निगरानी के लिए एक विशेष टीम गठित की गई थी जो रविवार की रात से सोमवार की रात तक सक्रिय रही। पड़ोसी जिले दमोह से आने वाल भक्तों के लिए मंदिर के ऊपरी हिस्से में मंगल भवन के पास पार्किग की व्यवस्था बनाई गई थी। सुरक्षा के दृष्टिकोण से मंदिर प्रांगण में लगे सभी सीसीटीवी कैमरों को चालू रखा गया।
अमावस्या पर रात भर खुला रहने वाला इकलौता मंदिर है जटाशंकर धाम
मंदिर के पुजारी हरिशंकर दुबे, रामअवतार तिवारी, खिलानंद गौतम और राकेश धतरा ने बताया कि जटाशंकर धाम वह इकलौता मंदिर है जो अमावस्या के दिन रात भर खुला रहता है। ऐसी मान्यता है कि अमावस्या की रात को भगवान शिव की जटाओं में चंद्रवास रहता है, जिसके दर्शन विशेष पुण्यदायी होते हैं।
लोकन्यास के संस्थापक सदस्य वयोवृद्ध मुन्नीलाल पांडे खैराकला बताते हैं कि अमावस्या के दिन पूरी रात मंदिर खुले रहने की परंपरा सैकड़ों वर्ष पुरानी है। पूर्व में लोग पैदल, बैलगाड़ी अथवा साइकिलों से अमावस्या के दो दिन पहले जटाशंकर धाम पहुंच जाते थे, और यहां रुक कर भोलेनाथ आराधना किया करते थे। मुन्नी लाल पांडे बताते हैं कि इस सिद्ध धार्मिक क्षेत्र को बुंदेलखंड का केदारनाथ भी कहा जाता है, यहां कई ऋषि-मुनियों ने तपस्या और साधना की है।








