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भारतीय ज्ञान परम्परा: अवलोकन विषय पर हुआ एकदिवसीय अभिविन्यास कार्यक्रम

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भारतीय दर्शन आध्‍यात्‍म का प्रतिनिधित्‍व करता है: डॉ. गिरीश त्रिपाठी

।छतरपुर। भारतीय ज्ञान परम्परा: अवलोकन विषय पर भारतीय ज्ञान परम्परा प्रकोष्ठ श्री कृष्णा विश्वविद्यालय द्वारा गुरूवार को एकदिवसीय अभिविन्यास कार्यक्रम का आयोजन विश्‍वविद्यालय के सभागार में किया गया। सर्वप्रथम प्रकोष्ठ के संयोजक डॉ.गिरीश त्रिपाठी सह.संयोजक डॉ. आशीष कुमार तिवारी और डॉ. आकाश सिंह ने माँ सरस्वती की प्रतिमा के सम्मुख दीप प्रज्जवलन कर किया। इस अवसर पर प्रकोष्ठ के सदस्य डॉ. अमित कुमार जैन, डॉ. राजेंद्र चौधरी, डॉ. आलोक पाण्डेय, डॉ. शिवेंद्र सिंह परमार, विवेक प्रताप सिंह भी उपस्थित रहे।प्रकोष्ठ के संयोजक विश्वविद्यालय के उपकुलगुरु डॉ.गिरीश त्रिपाठी ने भारतीय दर्शन और वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इसकी सार्थकता पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा है कि भारतीय ज्ञान परम्परा को समाहित किया गया। भारतीय दार्शनिक परंपराओं को आमतौर पर वेदों और उनमें निहित विचारों के साथ उनके संबंधों के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है। राष्‍ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुपालन में भारतीय ज्ञान परपंरा से संबंधित मूलवर्धित नेक के निरीक्षण में भी इसके निश्चत अंक निर्धारित हैं। आगे उन्‍होंने भारतीय दर्शन न्‍याय दर्शन, वैशैषिक दर्शन, सांख्‍य दर्शन, योग दर्शन, मीमांसा दर्शन और वेदान्‍त दर्शन पर भी अपने विचार व्‍यक्‍त करते हुए कहा कि दर्शन का सामान्‍य अर्थ देखना है। दर्शन वह शास्‍त्र है जिनमें प्रकृति, आत्‍मा, परमात्‍मा और जीवन के अंतिम लक्ष्‍य की विवेचना होती है। वास्‍तव में भारतीय दर्शन आध्‍यात्‍म का प्रतिनिधित्‍व करता है। अत: भारतीय ज्ञान परपंरा को पाठ्यक्रम में समाहित करने का उद्देश्‍य निश्चत ही युवा विद्यार्थियों को भारतीयता से जोड़ना है। भारतीय संस्कृति में गुरु शिष्य परम्परा पर अपने विचार व्यक्त करते हुए डॉ. आशीष कुमार तिवारी ने कहा कि शिक्षकों में त्याग तो शिष्यों में समर्पण का होना जरूरी है। गुरु शिष्य परंपरा भारतीय संस्कृति का एक अहम हिस्सा रहा है। भारतीय सभ्यता के अनुसार समाज में गुरु को भगवान से भी श्रेष्ठ माना गया है। छात्र शिक्षक को अपना आदर्श मानते थे, वही उनकी बताई गई बातों का अनुसरण करते थे। प्राचीन भारत में शिक्षा को अंतर्ज्याति एवं शक्ति का स्रोत माना गया है जो शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक शक्तियों के संतुलित विकास से मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन करती एवं श्रेष्ठ बनाती थी। इस काल में शिक्षा मनुष्य को इस योग्य बनाती है कि वह जीवन के उत्तरदायित्वपूर्ण कर्तव्यों का सहजता से निर्वाह करते हुए इहलोक एवं परलोक के सुखों को प्राप्त कर सके। इसलिए शिक्षा को मुक्तिप्रदायिनी कहा गया है। इस प्रकार प्राचीन भारत में गुरु-शिष्य सम्बध पारस्परिक स्नेह तथा सौहार्द्र पर निर्भर थे। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के समस्त प्राध्यापकगण एवं छात्र छात्राएं उपस्थित रहें। इस कार्यक्रम का संचालन प्रकोष्ठ के सह.संयोजक डॉ.आकाश सिंह एवं आभार विवेक प्रताप सिंह ने व्यक्त किया।

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