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चौथे दिन के नाटकों का कथासार

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आयोजन का पहला नाटक मशहूर रंगकर्मी और फिल्म कलाकार नादिरा जहीर बब्बर द्वारा लिखित दयाशंकर की डायरी, उत्तरप्रदेश के औरैया से आए कलाकार अखंड शर्मा ने बोधि सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्था औरैया के बैनर तले प्रस्तुत किया। यह एकल नाटक लगभग 50 मिनिट का था, जिसमें सिर्फ अखंड शर्मा ने दयाशंकर के संघर्ष की कहानी को बखूबी बयां किया। एक छोटे कस्बे का आदमी जो अपनी आंखों में फिल्म स्टार बनने का सपना संजाए मुंबई शहर आता है लेकिन उसे सिर्फ एक मामूली क्लर्क का काम मिलता है। यहां वह अपने छोटे से कमरे में एक दोस्त के साथ रहते हुए सुंदर दुनिया का ताना-बाना बुनने लगता है और अंतत: उसमें खुद ही फंस जाता है। विशेष बात यह है कि यह नाटक इंसानी दिमाग की अजीबोगरीब क्रियाओं पर बड़ी सरलता से प्रकाश डालता है। अखंड शर्मा के अभिनय से प्रभावित दर्शकों ने नाटक के अंत में खड़े होकर कलाकार का अभिवादन किया। सहयोगी के तौर पर प्रकाश व्यवस्था अभिदीप सुहाने और ध्वनि संयोजन राजेश कुशवाहा का रहा।नाट्य प्रस्तुति की कड़ी में अगला नाटक दयाप्रकाश सिन्हा का लिखा हुआ प्रेमकथा प्रस्तुत किया गया। यह नाटक रंग त्रिवेणी साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समिति भोपाल के कलाकारों ने रचना मिश्रा के निर्देशन में प्रस्तुत किया। आधे घंटे के इस नाटक में दर्शकों ने जमकर ठहाके लगाए। यह नाटक दो परिवारों की एक छोटी से कहानी है, जिसमें गांव का मास्टर अपनी बीवी को खूब पीटता है और गांव का पंचायत मंत्री उसे मारते हुए देखकर मास्टर की एफआईआर दर्ज करा देता है। इस बात पर मास्टर की बीवी को मंत्री पर गुस्सा आता है और वह फैसला करती है कि मैं मंत्री का घर बर्बाद कर दूंगी। इसके बाद वह मंत्री की बीवी के कान भरकर कहती है कि अगर तेरा पति तुझसे लड़ता नहीं, तूझे पीटता नहीं है तो तेरा पति मर्द नहीं है। उसकी बातें सुनकर मंत्री की बीवी आग बबूला हो जाती है और मंत्री के आने पर उससे खूब लड़ती है। अंत में मंत्री नाराज होकर अपनी बीवी को भी जमकर पीटता है और इसके बाद मंत्री की बीवी मास्टरनी से कहती है कि आज मेरे पति ने भी मुझे खूब मारा और अब वह भी मर्द बन गया। जिसके बाद दोनों जमकर हंसती हैं। यह नाटक हंसी-हंसी में महिलाओं के प्रति क्रूरता का सामाजिक संदेश देकर जाता है। प्रमुख कलाकारों में अनुज शुक्ला, पलक रामुसे, रत्नेश लोधी और वर्षा पांडे रहीं।

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