Home डेली न्यूज़ जीते जी शरीर भगवान को अर्पित करना ही सच्चा पिंडदान: डॉ प्रभु...

जीते जी शरीर भगवान को अर्पित करना ही सच्चा पिंडदान: डॉ प्रभु जी

38
0
Jeevan Ayurveda


छतरपुर। पद्म पुराण में श्रीमद्भागवत को पुराणों का तिलक कहा गया है भागवत ऐसी कथा है जो ज्ञानी और बैरागी सभी को आनंदित करती है,डॉ प्रभुजी गौतम ने दूसरे दिन की कथा सुनाते हुए कहा कि सबमें भगवान को देखिए,अभी मानव के द्वारा बनाई गई मूर्ति में तो हम भगवान देख पाते हैं पर भगवान द्वारा बनाए गए मानव में हम भगवान को देखते हैं,वहां हम भेद करते हैं, रामाजीनगर में तिवारी परिवार द्वारा आयोजित श्रीमद् भागवत कथा सुनने भारी भीड़ उमड़ रही है।
आत्मदेव,धुंधली,धुंधकारी और गोकर्ण की कथा सुनाते हुए डॉ प्रभु जी ने कहा कि आत्मदेव विशुद्ध आत्मा के प्रतीक हैं,धुंधली कुबुद्धि है, जिसके कुसंग के फलस्वरूप पापरूपी विपत्ति धुंधकारी पुत्र के रूप में जीवन में आती है, सद्बुद्धि रूपी गोकर्ण द्वारा सदमार्ग पर चलकर सभी का कल्याण किया जाता है। महाभारत में मदालसा का उपदेश है कि बच्चों को संतों की संगत भले न मिल पाए पर उन्हें बुरी संगत से बचाना ही चाहिए। गोकर्ण द्वारा कथा सुनने के बाद भगवान के पार्षद विमान लेकर धुंधकारी को बैकुंठ ले जाने के लिए आते हैं,कथा सुनने के परिणाम में भेद को लेकर गोकर्ण के प्रश्न पर पार्षद समाधान देते हैं कि कथा में तो सभी बैठे थे पर कथा सिर्फ धुंधकारी के मन में बैठी थी, इसीलिए भगवान का विमान सिर्फ धुंधकारी के लिए आया अन्य किसी श्रोता के लिए नहीं, बैकुंठ का मतलब है जीवन में कुंठा समाप्त हो जाना तथा विमान में बैठने का मतलब है मान रहित हो जाना,गोकर्ण द्वारा भाई धुंधकारी का गया जी में पिंडदान करने की व्याख्या करते हुए प्रभु जी ने कहा कि शरीर रूपी पिंड को भगवान की भक्ति में लगा देना ही सच्चा पिंडदान है। भागवत उपरांत विरक्त के लिए गीता पाठ और गृहस्थ के लिए हवन का विधान है, वेदव्यास जी ने श्रीमद्भागवत के मंगलाचरण में सत्य की वंदना की है क्योंकि सत्य ही धर्म है,वेद रूपी कल्पवृक्ष का फल भागवत है जिसे शुकदेव जी द्वारा रसीला और मीठा कर दिया गया है।
 देह रूपी वीणा से संसार में राग नहीं भगवान में अनुराग बढ़ाये
देवर्षि नारद के पूर्व जन्म की कथा सुनाते हुए डॉ प्रभुजी ने कहा कि देहरूपी वीणा संसार में राग की जगह भगवान से अनुराग बढ़ाने में प्रयोग कीजिए। भागवत की कथा तो महाभारत के अंत पर ही शुरू होती है, अश्वत्थामा द्वारा पांडवों के पुत्रों की नृशंस हत्या के बाद पांडवों के उत्तेजित होकर अश्वत्थामा की वध के लिए चलने की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि आवेश में व्यक्ति विवेक को देता है, हुआ भी वही अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र चला दिया तब श्रीकृष्ण ने उसके निवारण का उपाय बताया, नारायणस्त्र रूपी अमोघ अस्त्र से बचने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने विनम्रता पूर्वक जमीन पर लेट जाने को कहा, अर्थात नारायण के सामने दंडवत हो जाने पर उनका कोप कृपा में बदल ही जाएगा। उसके द्वारा पुन:  उत्तरा के गर्भ पर ब्रह्मास्त्र चलाया गया तब भगवान श्री कृष्ण ने उत्तरा के गर्भ में जाकर परीक्षित की रक्षा की, सृष्टि का यह अद्भुत उदाहरण है जहां भगवान और भक्त दोनों उत्तरा के गर्भ में कुछ दिनों तक एक साथ रहे। इस तरह भगवान ने उत्तरा को अपनी मां का दर्जा भी दे दिया, पांडवों के राजसिंहासन के बाद बुआ कुंती विपत्ति मांगती है, उनका तर्क है कि जब हम सुखी हैं तब आप हमें छोड़कर जा रहे हैं जब तक हमारे ऊपर विपत्ति थी तब आप हमारे साथ थे, हमें तो आपका साथ चाहिए, डॉ प्रभु जी ने कहा कि भगवान को याद रखना ही सबसे बड़ी संपत्ति है और भूल जाना सबसे बड़ी विपत्ति, भीष्म पितामह दुर्योधन की सेना में इसीलिए भी थे कि वह लगातार सामने रहकर भगवान श्री कृष्ण के दर्शन करते रहे, द्रोपदी के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि चीरहरण के समय भी मुझ में ज्ञान था ध्यान था पर दुर्योधन का कुधान्य खाने से उसका बखान नहीं कर सका। भीष्म पितामह ऐसे भक्त हैं जो अपने प्रचार-प्रसार की जगह भगवान की भक्ति का विस्तार करते है और यही सच्चे भक्त के लक्षण हैं। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण के परम धाम जाते ही कलयुग पृथ्वी पर आ गया था परंतु राजा परीक्षित के 30 वर्ष तक शासन करने के बावजूद वह अपना प्रभाव नहीं दिखा पाया, परीक्षित साधारण मानव नहीं अपितु परिषकृत हैं और कठिन से कठिन परीक्षा में सफल हैं, कलयुग ने उनसे प्रार्थना कि आप इतने धर्मात्मा है कि मैं अपना प्रभाव नहीं दिखा सकता हूं इसीलिए मुझे कुछ स्थान दीजिए। सोने में स्थान पाकर वह  राजा परीक्षित के मुकुट पर ही सवार हो गया प्रभु जी ने कहा कि भगवान श्री कृष्ण धातुओं में सोना खुद को बताते हैं फिर सोने में एकदम का बस कैसे संभव है इसकी व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि अनीतिपूर्वक अर्जित सोने पर कलयुग का वास है। राजा परीक्षित ने भी जरासंध के उस सोने के मुकुट को पहन रखा था  जिसे राजाओं से लूटा गया था, परिणामत: उसने समाधिस्थ ऋषि शमीक के गले में मरा हुआ सांप डाल दिया ऋषि पुत्र ने  सर्पदंश से राजा परीक्षित को सातवे दिन मौत का श्राप दे दिया।

Jeevan Ayurveda Clinic

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here