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पूरे प्रदेश के स्कूलों में शनिवारीय आनंद सभा का आयोजन

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कर्म तो बाई प्रोडक्ट है, इसलिए कर्म नहीं कर्ता का भाव बदलना है: लखनलाल असाटी
छतरपुर। शालेय शिक्षा विभाग,आनंद विभाग और ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन यूनिवर्सल हुमन वैल्यूज के तालमेल से प्रदेश के स्कूलों में शनिवार को होने वाली आनंद सभा में विद्यार्थियों के साथ मानवीय मूल्य पर विमर्श किया जा रहा है। प्रस्ताव के रूप में उनके सामने कुछ विचार रखे जाते हैं जिस पर उन्हें खुद में संवाद कर जांच परख करनी होती है। प्राचार्य लखन लाल असाटी ने विद्यार्थियों से संवाद करते हुए कहा कि कर्म बदलने की जगह कर्ता का भाव बदलने की आवश्यकता है कर्ता का भाव बदल जाएगा तो कर्म भी बदल जाएगा क्योंकि यह तो बाई प्रोडक्ट है। इस अवसर पर वरिष्ठ शिक्षक राजीव रमन पटेरिया शरद कुमार रामदेव एवं कुंवर सिंह केवट ने भी अपने विचार रखें विद्यार्थियों ने भी कई प्रश्नों के माध्यम से अपनी जिज्ञासा को प्रकट किया।
लखन लाल असाटी ने कहा कि खुद में चला रहे विचारों के पीछे इच्छा और भाव को समझने की आवश्यकता है। विद्यालय में विद्यार्थियों से जुड़े कुछ उदाहरण लेते हुए उन्होंने कहा कि जब आप स्कूल कैंपस में क्रिकेट और कैरम खेलते हैं तब अधिक साथी हो जाने पर आप प्राचार्य से शिकायत करने चले आते हैं कि हमें खेलने नहीं मिल रहा है। ध्यान पूर्वक खुद में जांच करेंगे तो पाएंगे कि इस विचार के पीछे की इच्छा पहले खेल लेने की है प्रायोरिटी प्राप्त करने की है, पर यदि उसके पीछे छुपे भाव देखेंगे तो विद्यालय के ही दूसरे छात्रों में हम संबंध का भाव नहीं देख पाते हैं। यदि संबंध का भाव देखते तो पहले उन्हें खेलने का मौका देते अथवा सबकी सहमति से कुछ ऐसा नियम बनाते कि सबको खेलने का समान अवसर मिल जाता, पर विचार के पीछे भाव और उसके पीछे संस्कारों को ना देख पाने के कारण समाधान की जगह हम शिकायत की ओर बढ़ते हैं, और बार-बार शिकायत का भाव हमारे संस्कार बिगाड़ता है वस्तुत: संस्कार तो हमारी गहरी मान्यताओं तथा लगातार जीने के तरीके का समुच्चय है। संस्कार सुधारने के लिए हमें लगातार खुद से संवाद करना होगा जब अंदर विरोध चलता है तो क्या हम सहज रह पाते हैं? सम्मान क्या अकेले हमें चाहिए अथवा सभी को?

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