
ताम्रकार समाज के जिला उपाध्यक्ष और बर्तन व्यापारी अभिषेक ताम्रकार ने बताया कि एक दौर था तब देश के अलग-अलग प्रांतों के ताम्र शिल्पी काम की तलाश में छतरपुर आते थे, और आज वह समय आ गया है जब स्थानीय ताम्र शिल्पी भी अपने कारोबार बंद कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि पहले छतरपुर में बने बर्तनों का बुंदेलखंड सहित पूरे देश में निर्यात होता था लेकिन जैसे-जैसे इन धातुओं की महंगाई बढ़ी, वैसे-वैसे लोगों का तांबा-पीतल के बर्तनों से मोह भंग होता गया। सबसे पहले लोग तांबे के पात्रों का इस्तेमाल दैनिक कार्यों में करते थे, इसके बाद जब तांबे की कीमतें बढ़ीं तो लोगों ने पीतल के पात्रों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। इसी तरह पीतल के बाद लोगों ने स्टील का और उसके बाद फाइबर (प्लास्टिक) के बर्तनों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। अभिषेक ताम्रकार ने कहा कि चूंकि सरकार भी ताम्र शिल्प कला को सहेजने का प्रयास नहीं कर रही है, इसलिए यह कारोबार और अधिक तेजी से लुप्त हो रहा है, यदि सरकार इस दिशा में प्रयास करे तो विलुप्त होती कला बची रहेगी। उन्होंने बताया कि सरकार इस कारोबार को बचाने की बजाय इस पर लगातार टैक्स बढ़ा रही है जिस कारण से युवा पीढ़ी का रुझान इस कारोबार की ओर नहीं है। उन्होंने बताया कि पहले सरकार तांबे और पीतल पर 5 फीसदी टैक्स लेती थी, जो वर्तमान में साढ़े 12 फीसदी लिया जा रहा है।








