छतरपुर। ब्रह्मर्षि मिशन समिति और राम जागरूकता आंदोलन द्वारा जबलपुर में आयोजित तीन दिवसीय विश्व रामायण सम्मेलन के द्वितीय दिवस छतरपुर के जिला पंचायत मुख्य कार्यपालन अधिकारी नम: शिवाय अरजरिया ने रोम में राम विषय पर अपना व्याख्यान दिया। कार्यक्रम में प्राचीन सभ्यताओं और भारतीय संस्कृति के गहरे अंतर्संबंधों पर एक महत्वपूर्ण शोध पत्र प्रस्तुत किया गया।श्री अरजरिया ने रोम में राम विषय पर अपना व्याख्यान देते हुए एट्रस्कन संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में तथ्य रखते हुए कहा कि इटली के प्राचीन नगर रेवेन्ना और रोम परस्पर 180 अंश पर ठीक उसी तरह स्थित हैं जैसे रामायण काल में रावण द्वारा बसाई गई लंका और इक्ष्वाकु वंश की अयोध्या स्थित थी। नम: शिवाय अरजरिया ने भाषायी साक्ष्यों का उदाहरण देते हुए बताया कि बुंदेलखंड और बघेलखंड की लोकगाथाओं में रावण को रेवेन्ना ही पुकारा जाता है, जो इटली के रेवेन्ना शहर से अद्भुत भाषायी समानता रखता है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि प्राचीन यूनान में एट्रस्कन जाति को तिरेनोई कहा जाता था और उनके समीप बहने वाले सागर का नाम तिरहेनियन है, जो वास्तव में भगवान शंकर के संबोधन त्रिनेत्र का ही अपभ्रंश प्रतीत होता है, क्योंकि यह जाति शिव की उपासक थी। शोध में यह संभावना जताई गई कि राम-रावण युद्ध के पश्चात रावण के अनुयायी लंका से पलायन कर सुदूर पश्चिम की ओर चले गए थे। विमर्श के दौरान यह प्रतिपादित किया गया कि विश्व के विभिन्न हिस्सों, विशेषकर इटली और रोमन साम्राज्य के उदय से पूर्व की संस्कृतियों में सनातनी सभ्यता के स्पष्ट अवशेष विद्यमान हैं। ऐतिहासिक और भाषायी साक्ष्यों के आधार पर यह तर्क दिया गया कि पाश्चात्य इतिहासकारों ने काल गणना और सभ्यता के अध्ययन के लिए केवल सीमित पुरातात्विक खनन को ही आधार बनाया, जबकि खगोलीय, सांस्कृतिक, जैविकीय और भाषायी सूत्रों की निरंतर उपेक्षा की गई। इस नवीन वैज्ञानिक दृष्टिकोण के माध्यम से लंका और अयोध्या के भौगोलिक विन्यास की तुलना इटली के प्राचीन नगरों से करते हुए रामायण कालीन संस्कृति के वैश्विक विस्तार और असुर जाति के पलायन के ऐतिहासिक साक्ष्यों को प्रस्तुत किया गया।










