दूसरा मामला गौरिहार जनपद पंचायत के हटवा गांव का है, जहां पक्की सड़क न होने से ग्रामीणों का जीवन संघर्षमय बना हुआ है। गौरिहार से करीब 22 किलोमीटर दूर हटवा पंचायत के तुलसिया पुरवा, नाई का पुरवा, बहादुर का पुरवा और पालो का पुरवा में करीब 400 लोग निवास करते हैं, लेकिन इन गांवों तक पक्की सड़क नहीं पहुंची। कच्चे और कीचड़ भरे रास्तों के कारण बीमार व्यक्तियों को खाट पर ढोकर मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता है, जहां से ही एम्बुलेंस या अन्य वाहन उपलब्ध हो पाते हैं। ग्रामीण पप्पू पाल ने बताया कि पंचायत कार्यालय की दूरी 2 किलोमीटर है, लेकिन कीचड़ भरे रास्तों के कारण मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाना मुश्किल हो जाता है। बरसात में स्थिति और बदतर हो जाती है, जब रास्ते दलदल में बदल जाते हैं। ग्रामीणों ने कई बार प्रशासन से पक्की सड़क की मांग की, लेकिन केवल आश्वासन ही मिले। ग्रामीणों का कहना है कि विकास के नाम पर सिर्फ कागजी वादे किए जा रहे हैं, जबकि जमीनी हकीकत में वे मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं।
सिस्टम पर सवाल, ग्रामीणों में आक्रोश
ये दोनों मामले ग्रामीण विकास के दावों पर गंभीर सवाल उठाते हैं। मड़वा में मुक्तिधाम की कमी और हटवा में पक्की सड़क का अभाव न केवल प्रशासन की उदासीनता को दर्शाता है, बल्कि सरपंच, सचिव और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही पर भी सवाल खड़े करता है। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक ठोस कार्रवाई नहीं होगी, तब तक विकास के दावे खोखले ही रहेंगे। जिला प्रशासन और जनपद पंचायत से ग्रामीणों ने तत्काल कार्रवाई की मांग की है। मड़वा में मुक्तिधाम निर्माण और हटवा में पक्की सड़क बनाने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है, ताकि ग्रामीणों को इन अमानवीय परिस्थितियों से निजात मिल सके।









