
(भक्ति के स्वरूप पर राम कथा का दूसरा दिन)
छतरपुर। भगवान राम की राजनीति सबको अपना बनाती है अयोध्या से वनवास पर भगवान राम,सीता जी और लक्ष्मण जी के साथ निकले थे, परंतु जब वह वापस अयोध्या लौटे तो पुष्पक विमान भरा हुआ था अर्थात भगवान राम की राजनीति का तात्पर्य है जो दूर है उसे पास लाया जाए। इसके विपरीत रावण की राजनीति सबको दूर करने की है। बुंदेलखंड गेराज में भक्ति के स्वरूप पर दूसरे दिन राम कथा कहते हुए संत श्री मैथिली शरण जी ने कहा कि खुद में भगवान राम की प्राण प्रतिष्ठा कर लीजिए पृथ्वी पर प्राण प्रतिष्ठा हुए बगैर नहीं रहेगी, यदि भक्त भगवान की भक्ति करता है तो भगवान भी अपने भक्त की भक्ति करते हैं भक्ति का स्वरूप तो आकाश की तरह व्यापक है।संत मैथिलीशरण जी ने कहा कि गरुणजी महाज्ञानी, गुणराशि और प्रभु के निकट निवासी हैं पर वह भी भगवान को नागपाश में बंधा देख मोहग्रस्त हो जाते हैं, लेकिन भगवान के भक्त कागभूसुंडी जी के आश्रम में प्रवेश करते ही उनका संपूर्ण मोह और संशय नष्ट हो जाता है यही है भक्ति की महिमा। उन्होंने कहा कि भक्ति, भक्त, भगवान और गुरु तत्व रूप में चारों एक ही है, गरुण जी अपने आप को ज्ञानी मानने लगे तो मोहग्रस्त हो गए। भगवान का दिया कोई भी उपादान मिथ्या नहीं है मिथ्या तो वह तब हो जाता है जब हम उसका दुरुपयोग करते हैं ठीक समय पर ठीक कार्य नहीं किया तो सब नष्ट हो जाएगा। दुरुपयोग से उपादान मिथ्या हो जाता है और सदुपयोग से सत्य, मैथिली शरण जी ने कहा कि शबरी के समक्ष भी भगवान समस्या ग्रस्त होकर गए हैं पर शबरी मोह ग्रस्त नहीं होती हैं अपितु भगवान के पूछने पर सीता जी का पता भी बताती हैं, जबकि वह जानती हैं कि संसार में ऐसा कोई पता नहीं है जहां सीताराम न हो, गरुण जी ने भगवान को तो बंधन मुक्त कर दिया पर खुद बंधन में ग्रस्त हो गए। क्योंकि उन्हें भगवान की जगह अपने गुण दिखाई देने लगे हैं, रामचरितमानस की विशेषता है कि उसके सभी पात्र एक दूसरे की प्रशंसा करते हुए दिखाई देते हैं। मैथिलीशरण जी ने कहा धन्य है वह भक्त जो भगवान को सर्दी में देखते हैं और उनके अंदर यह भाव आता है कि भगवान ने ऊनी वस्त्र नहीं पहने हैं, अंतत: जीव और भगवान दोनों के अंदर ब्रह्म ही है।संत के समक्ष संसार नहीं भगवान की चर्चा कीजिएमैथिलीशरण जी ने कहा कि जीवन में जब भी संत के समक्ष जाने का अवसर मिले तो सत्संग कीजिएगा। संसार की चर्चा नहीं अपितु भगवान की चर्चा करें। संसार की चर्चा करने पर संत के कान बंद हो जाते हैं, वल्लभाचार्य जी महाराज की निष्ठा समर्पण और भक्ति देखिए कि वह रेणु (रेत) को भी मधुर कहते हैं। भक्त की चापलूसी भी भगवान को अपनी स्तुति लगती है, चापलूसी स्तुति का ही अपभ्रंश है। उन्होंने कहा कि मधुर वचन बोलने से जीवन सुखमय होता है प्रयोग के तौर पर आप इसे कर के देख लीजिए जिस दिन आप सबसे मधुर वचन बोलकर अपने घर से निकलते हैं भाव शुद्धि के कारण उस दिन सारा काम ठीक होता है जबकि दोष के प्रतिपादन से आप तनाव में रहते हैं। कागभुसुंडि जी की भक्ति ने निर्गुण ब्रह्म के उपासक लोमस जी को भी भक्त बना दिया, उन्होंने कहा कि जिस तरह संघर्षण से लकड़ी से अग्नि प्रकट हो जाती है। उसी तरह प्रेम के उदय से भगवान प्रकट होते हैं, गुरु कमल को पैदा नहीं करता अपितु हृदय कमल खिलाकर प्रभु को प्रकट कर देता है।मान्यताओं का आवरण सत्संग से टूटता हैसंत श्री मैथिलीशरण जी ने कहा कि सत्संग से मान्यताओं का आवरण टूटता है। उन्होंने कहा कि श्रीमद् भागवत पितरों के मोक्ष के लिए नहीं अपितु खुद के कल्याण के लिए सुनी जानी चाहिए। संसार में लोग अंधे होते नहीं है अपितु काम अंधों वाला करते हैं, गांधारी इसका साक्षात उदाहरण है। गांधारी ने यदि आंखों में पट्टी नहीं बांधी होती तो शायद महाभारत नहीं होता क्योंकि उसकी दृष्टि का लाभ महाराज धृतराष्ट्र सहित पूरे परिवार को मिलता। उन्होंने कहा कि आप संसार में ऐसा कोई कार्य नहीं कर सकते हैं जो भगवान ना चाहता हो, और यही कारण है कि गांधारी के दुर्योधन को पूर्ण नग्न होकर सामने आने के आदेश के बावजूद वह कमर पर कपड़ा बांधकर आता है इसे ही कहते हैं हरि इच्छा और यही वस्त्र उसकी मौत का कारण बनता है, जबकि द्रोपदी के वस्त्र को बढ़ाने का काम है हरि कृपा। मैथिली शरण जी ने कहा की मान्यताओं की गांठे तोड़ दीजिए और भगवान के सामने साक्षात दंडवत हो जाइए। आपका कल्याण तो हो ही जाएगा केवट और भागीरथ की तरह आप पूरे परिवार का भी कल्याण कर देंगे। दृष्टि धुंधली होने पर विनाश रूपी धुंधकारी का जन्म होता है, तब कोई भक्त प्रहलाद और गोकर्ण बनकर दृष्टि को परिशुद्ध करता है।









