
भारतीय ज्ञान परंपरा विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का हुआ आगाज
छतरपुर। महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, छतरपुर में कुलगुरु प्रो. शुभा तिवारी के मार्गदर्शन में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा: शिक्षा, ज्ञान ,विज्ञान और जीवन विज्ञानÓ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ एक अप्रेल सोमवार को समारोहपूर्वक हुआ।यह राष्ट्रीय संगोष्ठी यूटीडी के समाजशास्त्र विभाग द्वारा आयोजित की जा रही है, जिसका समापन आज 2 अप्रेल को होगा।
यूनिवर्सिटी के जेसी बोस हाल में दो दिवसीय सेमीनार के पहले दिन एक अप्रैल को पूर्वान्ह इस राष्ट्रीय सेमीनार का उद्घाटन प्रो.अविनाश तिवारी, कुलगुरू जीवाजी यूनिवर्सिटी, ग्वालियर के मुख्य आतिथ्य एवं प्रो शुभा तिवारी कुलगुरु, एमसीबीयू, छतरपुर की अध्यक्षता में आयोजित हुआ। सेमीनार के इस सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में प्रो एडी शर्मा डॉ हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर, कुलसचिव यशवंत सिंह पटेल एवं आयोजन प्रभारी डा ममता बाजपेई मंचासीन रहे।
मीडिया समिति के संयोजक डा एसपी जैन एवं सदस्य पूजा तिवारी के मुताबिक मुख्य अतिथि डा अविनाश तिवारी, कुलगुरु, जीवाजी यूनिवर्सिटी, ग्वालियर ने अपने उद्बोधन में राष्ट्रीय शिक्षा नीति और भारतीय ज्ञान परंपरा के अंतर संबंध पर प्रकाश डाला।सीखना एवं शिक्षण प्रक्रिया के बीच अंतर समझाते हुए अपने व्यक्तिगत जीवन से जुड़े अनेक उदाहरण प्रस्तुत किए। आपने कहा कि हमारी शिक्षण पद्धति गुरुकुल परंपरा से शिक्षक छात्र परपंरा में बदल गई है।
की – नोट स्पीकर प्रो एडी शर्मा, डा हरीसिंह गौर यूनिवर्सिटी, सागर ने अपने उद्बोधन में कहा कि जाति, धर्म ,ज्ञान की अस्मिता से अनभिज्ञ थे।अग्रेजों ने एक नया वर्ग स्थापित किया।ऐसा माना जाने लगा कि ज्ञान की सारी जड़ें पश्चिम में हैं।देव से देश तक और राम से राष्ट्र तक भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रतीक है।आज भारत को शक्ति बढ़ रही है, आर्थिक तथा राजनैतिक ताकत के रूप में उभर रहा है, इसके साथ हम अपनी भारतीय ज्ञान परंपरा से भी गहराई से जुड़ें।देश में अंग्रेजों ने मंदिर के प्रति आस्था को तोड़ा, हमारी भारतीय ज्ञान परंपरा को तोड़ा।
उद्घाटन सत्र के पश्चात प्रथम तकनीकि सत्र प्रारंभ हुआ, इस सत्र में Óवैश्विक ज्ञान परंपराओं में साहित्यिक और कलात्मक अभिव्यक्ति तुलनात्मक अध्ययनÓ विषय पर प्रो ओमप्रकाश सिंह जेएनयू, दिल्ली ने प्रकाश डाला। द्वितीय तकनीकि में ‘वैदिक परम्परा और शिक्षाÓ विषय पर वक्ताद्वय प्रो संतोष कुमार शुक्ला जेएनयू दिल्ली तथा डॉ किरण आर्या डॉ हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर के व्याख्यान के साथ साथ अन्य विद्वानों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। प्रो संतोष शुक्ला जेएनयू, दिल्ली ने अपने उद्बोधन में भारतीय ज्ञान परम्परा की तुलना यूरोपीय ज्ञान परम्परा से की। उन्होंने कहा कि आवश्यकता हमें अपने वैदिक ज्ञान, परम्परा और गौरव को पहचानने की है। भारतीय गुरुकल परम्परा पर विस्तार से चर्चा की। डा किरण आर्या ने अपने व्याख्यान में कहा कि अगर हमें अपने मस्तिष्क को सेट करना है तो भारतीय ज्ञान परम्परा को समझना होगा और वैदिक परंपरा की और लौटना होगा। पहले शिक्षा का उद्देश्य मोक्ष प्राप्ति था।








