
कृष्ण और सुदामा की मित्रता प्रेम का प्रतीक है-श्री कौशिक जी
छतरपुर । चेतगिर कॉलोनी के श्री हनुमान मंदिर में चल रही भागवत कथा में समापन दिवस पर बुधवार को आचार्य भगवती प्रसाद जी कौशिक ने कहा कि आज इतने युगों के बाद भी दुनिया कृष्ण और सुदामा की मित्रता को प्रेम के प्रतीक के रूप में याद करती है। कृष्ण और सुदामा का प्रेम यानी सच्चे मित्र का प्रेम। धन-दौलत, रंग-रूप और भेद-भाव से परे निस्वार्थ प्रेम।आचार्य श्री कहते हैं कि किसी दूसरे के हक पर किसी दूसरे का अधिकार नहीं है। गुरू मां ने सुदामा को चने देकर कहा था कि इस प्रसाद को दोनों भाई मिलकर लेना। पर सुदामा तो भूख से व्याकुल थे इसलिए उन्होंने बिना कृष्ण को बताए है चने खा लिए। जब गुरू मां को इस बात का पता चला तो उन्होंने सुदामा का निर्धन होने का श्राप दे दिया। इस श्राप को सुनकर उनके मित्र कृष्ण दुखी हुए। गुरूदेव श्रीकृष्ण की भावों को देखकर समझ गए और वेे सुदामा को आर्शीवचन देते हुए बोले शिष्य चिन्ता मत करो, जब तुम द्वारिकाधीश की शरण में जाओगे तो तुम गुरू मां के इस श्राप से मुक्त हो जाओगे।श्री कौशिक जी कहते हैं कि सुशीला के प्रेरणा से जब सुदामा जी अपने मित्र श्रीकृष्ण के यहां मिलने पहुंचे तो कान्हा ने उन्हें अपने गले से लगाकर गुरू मां के श्राप से मुक्त किया। आचार्य श्री कहते है कि जीवन में मनुष्य को गुरू की उतनी ही आवश्यकता होती है जितनी शिशु को माता-पिता की। सच्चे गुरू के द्वारा ही मानव जीवन सफल होता है। महाराज परीक्षित सच्चे गुरू की शरण के कारण ही मृत्यु भय से दूर हुए। श्री कौशिक जी कहते है कि जन्म-मरण का बंधन गुरू कृपा से छूट सकता है। श्रीमद्भागवत एक अद्धितीय ग्रंथ है। इसके मार्गदर्शन से प्राणी जीवन का लाभ प्राप्त कर सकता है। हर प्राणी को अपने जीवन में कम से कम एक बात तो अवश्य ही इस अमृत कथा का पान करना चाहिए जिससे जन्म-मृत्यु के बंधन से छुटकारा मिल सके।कथा के अन्त में श्री कौशिक जी ने भागवत के महत्व का श्रवण कराकर भगवान से प्रार्थना की, कि वे श्रोताओं के ऊपर कृपा बनाए रखते हुए उन्हें सुख, समृद्धि और वैभव से परिपूर्ण करें। तत्पश्चात महाराज श्री ने व्यास गद्दी से सभी श्रोताओं को आर्शीवाद दिया। गुरूवार को सुबह हवन-पूजन के पश्चात विशाल भण्डारा होगा, जिसमें प्रसाद पाने के लिए सभी भक्तजन पधारने का कष्ट करें।









